कहानी एक पौधे की…

एक पौधा था,,,, ख़ुद से खफ़ा उम्र भर
वो खिल न सका
अपनों के तानों की
तेज़ धूप में झुलसता रहा

प्यार की थोड़ी सी फुहार को
तरसता रहा
अपने ही काँटों के ज़ख़्मों से
छलनी रहा

सह कर मार बेरहम वक़्त की
खड़ा रहा
देखकर नन्हे पौधों को बढ़ते हुए
मुस्कुराता रहा

दिल में पेड़ बन छांव देने की ख़्वाहिश
लिए खड़ा रहा
अचानक़ एक ठंडी हवा के झोके ने फ़िर
उसको छुआ

उसके झुलसे, कुम्हलाये बदन पर एक
मरहम लगा
उसके पीले पड़े पत्ते कुछ हरे से हुए
वो हंसने लगा

माली था खूंखार पौधे पर उसका एकाधिकार
आग, बबूला हुआ
वो पौधा अब धीरे-धीरे बढ़ने लगा था
ऊर्जा से नयी भरने लगा था

वो शीतल हवा का झोंका उसके चारों
तरफ़ अब बहने लगा
माली देख न सका उन दोनों का ये परिहास
खफ़ा हो गया

एक दिन पौधे को उखाड़ बगिया से
बाहर किया
उस हवा के झोंके ने उसको सहारा दिया
अपनें संग ले गया

ज़माने के उसको फ़िर ताने मिले
जिस पेड़ से पैदा हुआ वो कट के गिरा
नियति ने फ़िर कुचक्र रचा
वो नन्हा पौधा सर झुकाये

उस कट कर गिरे पेड़ की आख़िरी
ख़्वाहिश की ख़ातिर
फ़िर उन्ही नुकीली, कंटीली झाड़ियों में
सर झुकाये वापस आ लगा

फ़िर इसी उम्मीद में की कोई
प्यार के मरहम से उसकी
ज़ख़्मी आत्मा और वीरान हुए दिल को
आबाद करेगा… !!

तुम्हारे शब्दों के मोती…

तुम्हारी क़लम की दहलीज़ पार कर निकला हर शब्द मेरे लिए मोती है
जिन्हें मैं अपने मन के आँचल में समेट लेती हूँ

और मेरे दिल के आँगन में उन मोतियों के फ़ूल खिलते हैं… तुम्हारे हर लफ़्ज़ का रेशमी धागा इन मोतियों के इर्द-गिर्द फैलता रहता है

देखना तुम इन मोतियों को
उकेर दूँगी किसी दिन फ़ूलों से सजी श्वेत चादर पर
तुम्हारे शब्दों को सिरहाना बनाकर
दुबक जाऊँगी किसी मासूम बच्चे सी उस मखमली चादर पर और सुख की नींद सो जाऊँगी

एक दिन महकेगा मेरा पूरा गुलशन तेरे शब्द रूपी फ़ूलों की महक़ से
और ये थाम लेंगे मेरा आँचल

जिस दिन मुलाक़ात होगी ज़िन्दगी [ तुम से ]
उस लम्हा ज़िन्दगी महक़ जायेंगी
दूँगी तुम्हें मैं इन फ़ूलों का नज़राना
तुम कबूल करोगे न

मेरे आँचल के लिए बस एक मोती काफ़ी है
तुम बस प्यार से मेरा माथा चूम कर
कुछ शब्द अंकित कर देना वहाँ 🤗🖤

एक रिश्ता कुछ यूँ भी…

हमारी ज़िन्दगी में कोई ऐसा भी होता है, जिससे बात करके हमें सुकूँ मिलता है

जिनसे हमारी कोई चाह नहीं जुड़ी होती

फ़िर भी वो हमारे लिए ज़रूरी होते हैं

अंधेरी शब़ में किसी जुगनू की मानिंद उनकी रौशनी हमारी, अंधेरी ज़िन्दगी के रास्तों को रौशन कर देती है

वो एक बे-नाम सा ताल्लुक़

कभी दोस्ती के पर्दें में छुपा

या कभी कोई ऐसा रिश्ता जिसे नाम देना मुश्किल

जो सबसे अहम और सबसे जुदा महसूस होता है

ये जानते हुए भी कि

किसी भी वक़्त इस नाज़ुक से रिश्ते की डोर हमारे हाथ से छूट सकती है,,, फ़िर भी वो हमारे लिए अज़ीज़ हो जाते हैं

एक ऐसा रिश्ता जिसे हम खोना नहीं चाहते और कोई नाम भी नहीं देना चाहते

ऐसे लोग हमारे दिल के सबसे अहम कौने में ज़गह पाते हैं,,, और ख़ामोशी के साथ हमेशा-हमेशा के लिए हमारी दुआओं और वफ़ाओं में ज़िन्दा रहते हैं ❤🖤

शायद हर किसी की ज़िन्दगी में होता होगा एक ऐसा ही ख़ूबसूरत सा बेनाम रिश्ता चाहत का…

ये_तुम्हारे लिए 🤗

सवाल, जबाब…

कुछ सवाल, कुछ जबाब

कुश… एक सवाल था


राधा… क्या

कुश… कोई भी लड़की शादी के लिए, लड़के में कौन सी क्वालिटी चैक करती है

राधा… आजकल तो लुक और जॉब मैटर करती है 😁

कुश… ओके, मतलब ये दोनों न हों तो लड़का फॉरेवर सिंगल रहेगा 🙄

राधा… हाहाहा

अरे हर लड़की एक जैसी नहीं होती न
हरेक को बड़ा घर ख़ूब सारा पैसा और स्मार्ट लड़का नहीं चाहिए होता

वो तो बस मर मिटती है लड़के की सादगी पर, उसकी परवाह पर, उसकी छोटी, छोटी बातों पर
भले ही उसका घर बड़ा न हो, पर दिल में इतनी ज़गह हो कि उसके लिए कभी कम न पड़े वो ज़गह

पैसे बहुत सारे न कमाता हो पर उसकी हर ज़रूरत का ख़्याल रखता हो

कुश…कहा मिलेगी ऐसी लड़की ?

राधा… कम ही बनती हैं अब ऐसी लड़कियाँ शायद और मिलती किस्मत वालों को हैं

कुश… आप जिसे मिली हो वो किस्मत वाला है 🤗

कुछ_बातें

कुश_राधा

माँ…

माँ

जब कभी मैं रूम से बाहर होती और माँ का फ़ोन आता तो
मैं एक, दो मिनट बात कर, ये कहकर फ़ोन रख देती की रूम पर जाकर फ़ोन करती हूँ मम्मी अभी बाहर हूँ

और आकर भूल जाती की माँ को कॉल करनी है
दो, तीन दिन इंतज़ार करके मम्मी का ही कॉल आता और कहतीं

बेटा अभी तक तुम रूम पर नहीं पहुंची
मम्मी भूल गयी थी कह कर मना लेती थी

और अब
तीन महीने से माँ का फ़ोन नहीं आया
आयेगा भी नहीं, वो जहाँ चलीं गयी वहाँ से न वो आयेंगी कभी न उनका कॉल 😥

सॉरी माँ

इरफ़ान खान का आख़िरी ख़त…

अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं…इरफान खान का आखिरी ख़त पढ़िये…

कुछ महीने पहले अचानक मुझे पता चला था कि मैं न्यूरोएंडोक्रिन कैंसर से ग्रस्त हूं। मैंने पहली बार यह शब्द सुना था। खोजने पर मैंने पाया कि इस शब्द पर बहुत ज्यादा शोध नहीं हुए हैं। क्योंकि यह एक दुर्लभ शारीरिक अवस्था का नाम है और इस वजह से इसके उपचार की अनिश्चितता ज्यादा है। अभी तक अपने सफ़र में मैं तेज़-मंद गति से चलता चला जा रहा था … मेरे साथ मेरी योजनाएं, आकांक्षाएं, सपने और मंजिलें थीं। मैं इनमें लीन बढ़ा जा रहा था कि अचानक टीसी ने पीठ पर टैप किया, ’आप का स्टेशन आ रहा है, प्लीज उतर जाएं।’ मेरी समझ में नहीं आया… न न, मेरा स्टेशन अभी नहीं आया है…’ जवाब मिला, ‘अगले किसी भी स्टॉप पर उतरना होगा, आपका गंतव्य आ गया…’ अचानक एहसास हुआ कि आप किसी ढक्कन (कॉर्क) की तरह अनजान सागर में अप्रत्याशित लहरों पर बह रहे हैं। लहरों को क़ाबू करने की ग़लतफ़हमी लिए

इस हड़बोंग, सहम और डर में घबरा कर मैं अपने बेटे से कहता हूं, ’आज की इस हालत में मैं केवल इतना ही चाहता हूं… मैं इस मानसिक स्थिति को हड़बड़ाहट, डर, बदहवासी की हालत में नहीं जीना चाहता। मुझे किसी भी सूरत में मेरे पैर चाहिए, जिन पर खड़ा होकर अपनी हालत को तटस्थ हो कर जी पाऊं। मैं खड़ा होना चाहता हूं।’
ऐसी मेरी मंशा थी, मेरा इरादा था…


कुछ हफ़्तों के बाद मैं एक अस्पताल में भर्ती हो गया। बेइंतहा दर्द हो रहा है। यह तो मालूम था कि दर्द होगा, लेकिन ऐसा दर्द? अब दर्द की तीव्रता समझ में आ रही है। कुछ भी काम नहीं कर रहा है। न कोई सांत्वना और न कोई दिलासा। पूरी कायनात उस दर्द के पल में सिमट आयी थी। दर्द खुदा से भी बड़ा और विशाल महसूस हुआ।

मैं जिस अस्पताल में भर्ती हूं, उसमें बालकनी भी है। बाहर का नज़ारा दिखता है। कोमा वार्ड ठीक मेरे ऊपर है। सड़क की एक तरफ मेरा अस्पताल है और दूसरी तरफ लॉर्ड्स स्टेडियम है। वहां विवियन रिचर्ड्स का मुस्कुराता पोस्टर है, मेरे बचपन के ख़्वाबों का मक्का। उसे देखने पर पहली नज़र में मुझे कोई एहसास ही नहीं हुआ। मानो वह दुनिया कभी मेरी थी ही नहीं।
मैं दर्द की गिरफ्त में हूं

और फिर एक दिन यह एहसास हुआ… जैसे मैं किसी ऐसी चीज का हिस्सा नहीं हूं, जो निश्चित होने का दावा करे। न अस्पताल और न स्टेडियम। मेरे अंदर जो शेष था, वह वास्तव में कायनात की असीम शक्ति और बुद्धि का प्रभाव था। मेरे अस्पताल का वहां होना था। मन ने कहा, केवल अनिश्चितता ही निश्चित है

इस एहसास ने मुझे समर्पण और भरोसे के लिए तैयार किया। अब चाहे जो भी नतीजा हो, यह चाहे जहां ले जाए, आज से आठ महीनों के बाद, या आज से चार महीनों के बाद, या फिर दो साल… चिंता दरकिनार हुई और फिर विलीन होने लगी और फिर मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया!
पहली बार मुझे शब्द ‘आज़ादी ‘ का एहसास हुआ, सही अर्थ में! एक उपलब्धि का एहसास

इस कायनात की करनी में मेरा विश्वास ही पूर्ण सत्य बन गया। उसके बाद लगा कि वह विश्वास मेरे हर सेल में पैठ गया। वक़्त ही बताएगा कि वह ठहरता है कि नहीं! फ़िलहाल मैं यही महसूस कर रहा हूं

इस सफ़र में सारी दुनिया के लोग… सभी, मेरे सेहतमंद होने की दुआ कर रहे हैं, प्रार्थना कर रहे हैं, मैं जिन्हें जानता हूं और जिन्हें नहीं जानता, वे सभी अलग-अलग जगहों और टाइम ज़ोन से मेरे लिए प्रार्थना कर रहे हैं। मुझे लगता है कि उनकी प्रार्थनाएं मिल कर एक हो गयी हैं… एक बड़ी शक्ति… तीव्र जीवन धारा बन कर मेरे स्पाइन से मुझमें प्रवेश कर सिर के ऊपर कपाल से अंकुरित हो रही है

अंकुरित होकर यह कभी कली, कभी पत्ती, कभी टहनी और कभी शाखा बन जाती है… मैं खुश होकर इन्हें देखता हूं। लोगों की सामूहिक प्रार्थना से उपजी हर टहनी, हर पत्ती, हर फूल मुझे एक नयी दुनिया दिखाती है।

एहसास होता है कि ज़रूरी नहीं कि लहरों पर ढक्कन (कॉर्क) का नियंत्रण हो… जैसे आप क़ुदरत के पालने में झूल रहे हों!

लंदन में इलाज के दौरान, जब इरफ़ान जिनके सिरहाने की एक तरफ़ ज़िंदगी थी और दूसरी तरफ़ अंधेरा, ने आत्मा की स्याही से यह ख़त लिखा था। (यह ख़त इरफ़ान ने वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज को भेजा था)

मन का कमरा…

मेरे मन का यह बंद कमरा
सूना-सूना ख़ामोश सा

लिपटी ये तन्हाई दीवारों से
रंगत भी रात सी
गहरी स्याह

यह बंद कमरा
अंधेरे में छटपटाता
पर बेबस सा

तुम उस ज़ानिब
मैं इस ज़ानिब
और
दरमियाँ मीलों की दूरी

उफ़्फ़ कि
तुम भी तन्हा रहे
हम भी तन्हा रहे…!!

टुकड़े दिल के…

टूट कर बिख़र जाने के बाद दिल के टुकड़े पूरी तरह कभी जुड़ नहीं पाते

चाहे कितनी भी कोश़िश कर लो कुछ टुकड़े कभी नहीं मिलते

ज़हन के कोनों में दिल के कुछ टुकड़े छुप जाते हैं

जैसे काँच के टुकड़े घुस जाते हैं कभी दरीचों के नीचे तो कभी सोफे के पास

और

कुछ टटोलते हुए काँच का टुकड़ा अचानक हथेली में चुभ जाता है जो कई रोज़ तकलीफ़ देता है

वैसे ही ख़ाली बैठे कोई बीता लम्हा याद आ जाता है और दिल का कोई एक खोया टुकड़ा अचानक ज़हन छलनी कर देता है…!!

पगले_ख्याल

रिश़्ते…

कभी सोचा होता है हमनें….

जिनसे हम बात करने तक की नहीं सोचते उनसे गहरे रिश़्ते हो जाते हैं

और जिन रिश़्तों को एहसासों की नमीं देकर सींचने की कोश़िश करते हैं

वक़्त के साथ
वही रिश़्तों के पौधे सूख जाते हैं…!!

उफ़्फ़फ़

ये रिश़्ते भी न…

स्त्रियाँ…

स्त्रियाँ रहस्यमयी हैं

और उनकी आँखों से बहते आँसू उनका रहस्योद्घाटन

एक स्त्री एक सुन्दर गीत सुनते ,गुनगुनाते हुई रो देती है

फ़िर भी हममें से कितने कम जान पाते हैं कि वो प्रेम में थी या दुःख में

तुम्हें जितनी बार क्रोध आए…जितनी बार भी तकलीफ़ या दुख पहुँचे… उतनी बार आस,पास ख़ाली पड़ी ज़मीन या गमले में एक गड्ढा खोदना

और उस गड्ढे में बो देना एक बीज…जीवन जितनी बार रुलाए तुम्हें उतनी बार


सींचना उन्हें …एक दिन वो सारे बीज तुम्हारी मुस्कुराहट का कारण बनेंगे…!!